विधायक की कुर्सी के लिए टिकट की आस...2027 की जंग के लिए नेताओं ने बदला 'सियासी लिबास'
वफादारी किस चीज का नाम है, अब तो बस टिकट प्यारा है, पार्टी का चोला बदलकर 2027 की तैयारी में हर नेता 'बेचारा' है
बीते ढाई दशकों में कई नेता ऐसे, जिन्होंने पार्टियां बदल-बदलकर लड़ा चुनाव
कुछ नेताओं ने सियासी लाभ देखकर भाजपा और सपा का दामन थामा
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बदायूं। 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में हार-जीत का फैसला तो जनता करीब एक साल बाद करेगी, लेकिन नेताओं के बीच अभी से टिकट की आस लगनी शुरू हो गई है। खास बात ये है कि कल तक जिस झंडे को गाली दी जा रही थी, आज उसी को कंधे पर उठाने की तैयारी है। सिद्धांतों की 'पोटली' खूंटी पर टांग दी गई है और विचारधारा का 'चोला' बदला जा चुका है। सवाल यह है कि जो नेता अपनी निष्ठा एक पार्टी के प्रति नहीं टिका पा रहे, वो जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरेंगे। और अभी तो चुनाव में करीब एक साल का वक्त है। इस वक्त में न जाने कितने नेता गिरगिट को भी मात करेंगे, यह अभी से कहना मुश्किल हैं।
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ढाई दशकों में बदलीं कई पार्टियां, अब 'जिताऊ' से टिकट की उम्मीद
बदायूं। बीते ढाई दशकों यानी साल 2002 के चुनाव से अब तक की बात करें तो कई नेता ऐसे हैं जिन्होंने सियासी लाभ के लिए कई-कई बार पार्टियां बदलीं तो कभी विधानसभा क्षेत्र बदलने से भी परहेज नहीं किया। यानी कुर्सी की खातिर उसूल टूटते रहे और निष्ठा व वफादारी बदलती रही। अब जब साल 2027 का चुनाव नजदीक है तो फिर तमाम नेता सियासी लबादा बदलकर टिकट पाने की जुगत में लग गए हैं।
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चुनाव बदले, पार्टियां बदलीं, अब ओढ़ लिया नया 'चोला'
बदायूं। बदायूं विधानसभा से साल 2002 के चुनाव में बसपा के टिकट पर लड़े विमल कृष्ण अग्रवाल विधायक चुने गए थे लेकिन बदायूं से 2007 और बिल्सी से 2012 का चुनाव उन्होंने सपा के झंडे के नीचे लड़ा। दोनों ही बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। भाजपा की लहर चलती देख विमल कृष्ण ने 2022 में कमल का फूल थाम
लिया। इसी तरह बदायूं विधानसभा क्षेत्र से ही पुराने कांग्रेसी रहे फखरे अहमद शोबी ने 2002, 2007 और फिर 2012 का चुनाव कांग्रेस के टिकट से लड़ा। हर बार वह चौथे स्थान पर ही रहे। कांग्रेस में रहकर विधायकी का सपना पूरा न होते देख उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन पकड़ लिया, हालांकि तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें सपा ने अब तक टिकट नहीं दिया है।
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पुराने कांग्रेसी और बसपाई हुए भाजपाई
बदायूं। दातागंज विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस से कई बार विधायक रहीं संतोष कुमारी पाठक का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। संतोष कुमारी के बेटे शैलेश पाठक की भी राजनीतिक विचारधारा शुरुआत से कांग्रेसी रही। साल 2002, 2007 और 2012 का चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा, लेकिन
बदकिस्मती से हर बार उन्हें हार का ही सामना करना पड़ा। वह कभी दूसरे, कभी तीसरे तो कभी चौथे स्थान तक पर सिमटकर रह गए। कांग्रेस से विधायक न बन पाने और पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता रहने के कारण उन्होंने 2022 में भाजपा का चोला ओढ़ लिया। कुछ ऐसा ही रहा सिनोद कुमार शाक्य के साथ, जो बसपा के टिकट पर 2007 और फिर 2012 में दो बार विधायक चुने गए। 2002 और 2017 का चुनाव भी वह बसपा के टिकट पर लड़े थे लेकिन जीत नहीं पाए। 2022 में उन्होंने भी लहर चलती देख भाजपा का साथ पकड़ लिया। अब दोनों ही नेताओं के समर्थक उन्हें दातागंज सीट से भाजपा के दावेदारों के रूप में पेश कर रहे हैं।
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और भी हैं वक्त के साथ पार्टियां बदलने वाले
बदायूं। केवल यही नहीं और कई नेता भी हैं जिन्होंने मौके की नजाकत भांपकर टिकट पाने या चुनाव जीतने की लालसा में पार्टी छोड़कर दूसरी नाव में सवार होने में देर नहीं लगाई। साल 2002 में बसपा के टिकट से विनावर विधानसभा से चुनाव जीतकर विधायक और मंत्री बनने वाले भूपेंद्र सिंह दद्दा ने 2007 का चुनाव भी विनावर से सपा के टिकट पर लड़ा लेकिन जीत नहीं पाए। 2012 में जब सपा से टिकट नहीं मिला तो वह महान दल में शामिल हो गए और बदायूं से चुनाव लड़ा। 2017 में टिकट पाने के लिए वह फिर से बसपा में शामिल हो गए और चुनाव में ताल ठोंकी, लेकिन फिर भी विधायक बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया। वर्तमान सपा नेता काजी मो. रिजवान ने 2012 और 2017 का चुनाव शेखूपुर विधानसभा क्षेत्र से बसपा के टिकट पर लड़ा, लेकिन वहां से जीत न मिलती देख सपाई चोला ओढ़कर उन्होंने कई टिकट पाने का प्रयास किया, लेकिन टिकट पाने में ही सफल नहीं हो सके। इसी तरह बसपा से विधायक रह चुके हाजी बिट्टन भी अब सपाई हो चुके हैं।
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कभी भाजपा तो कभी बसपा, तो कभी कल्याण सिंह का हाथ थामा
बदायूं। बिल्सी से विधायक रह चुके योगेंद्र सागर 1993 में भाजपा से विधायक चुने गए थे। 1996 का चुनाव भी उन्होंने भाजपा के टिकट पर लड़ा लेकिन मायावती से चुनाव हार गए। 2002 में जब भाजपा ने उनका टिकट काटा तो वह पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी में शामिल हो गए और चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं पाए। इसके बाद 2005 में वह बसपा में शामिल हुए और 2007 का चुनाव बसपा के टिकट पर जीता। 2012 का चुनाव उन्होंने बसपा के टिकट से अपनी पत्नी प्रीति सागर को बिसौली सीट से लड़ाया लेकिन वह जीत नहीं पाईं। इसके बाद उनके बेटे कुशाग्र सागर ने भाजपा के टिकट से 2017 का चुनाव लड़कर जीत दर्ज की, लेकिन 2022 का चुनाव कुशाग्र हार गए।
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