हे भाजपा की 'नारी शक्ति', कुछ तो लाज रख ली होती मीडिया की...अखबारों की ही 'आहुति' दे डाली

हे भाजपा की 'नारी शक्ति', कुछ तो लाज रख ली होती मीडिया की...अखबारों की ही 'आहुति' दे डाली

वाह! अभी जलाएंगे, बाद में नाम छपवाएंगे, फिर फेसबुक पर होगा प्रचार...'मीडिया की नजर में'

पब्लिसिटी की अंधी दौड़ में मीडिया की 'आहुति'... क्या यही है भाजपा की नारी शक्ति का विवेक?

मन की बात...

(सौरभ सक्सेना)

अखबार...यानी किसी के लिए खबरों का 'समंदर' तो किसी के लिए सुबह की चाय का साथी। किसी के लिए प्रचार का 'औज़ार', तो किसी के लिए ज्ञान का खजाना। और हां...किसी के लिए बस कागज़ का टुकड़ा, जिसे सुबह बड़ा सहेजकर पढ़ा जाता है और दोपहर होते-होते घर के किसी कोने में फेंक दिया जाता है।

लेकिन एक पत्रकार के लिए...

अखबार कागज़ नहीं होता, वो उसकी सांस होता है, उसका संघर्ष होता है, उसका पूरा दिन-रात होता है। एक पत्रकार, जो दिन भर सड़कों की धूल छानता है, कभी तपती धूप में पसीना बहाता है, तो कभी कोहरे, सर्दी और बारिश से लड़ता है। रिश्तों से समझौता करता है, परिवार को वक्त नहीं दे पाता। सिर्फ इसलिए कि सच अगले दिन आपके दरवाज़े तक पहुंच सके। उसके लिए ये सिर्फ छपा हुआ कागज़ नहीं, जीती-जागती जिम्मेदारी होती है।

और उसी अखबार को, उसी मेहनत को, उसी सच को, भाजपा की 'महिला शक्ति' ने तमाशा बना दिया। जिसे सम्मान मिलना चाहिए था, उसे पुतले पर लपेटकर सरेआम जलाया गया। जिसे पढ़कर जागरूकता फैलती है, उसे नारेबाजी की आग में झोंक दिया गया।

ये विरोध नहीं था, ये संवेदनहीनता का प्रदर्शन था। ये आक्रोश नहीं था, ये उस मेहनत का अपमान था, जो हर दिन बिना शोर के आपकी सेवा में लगी रहती है। विरोध प्रदर्शन करते समय भाजपा की यह महिला शक्ति ने साबित कर दिया, कि उन्हें इन अखबारों में छपकर जनता की नजरों में हीरो तो बनना है, लेकिन वही अखबार उनकी नजरों में महज 'रद्दी' के सिवा कुछ और नहीं है। 

मंगलवार को बदायूं में भाजपा महिला शक्ति के कार्यक्रम में विरोध प्रदर्शन के नाम पर जो तमाशा हुआ, उसने पार्टी से जुड़ी महिलाओं के बौद्धिक दिवालियापन को जगजाहिर कर दिया। विपक्ष का पुतला जलाना आपका लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन उस पुतले पर उन प्रतिष्ठित समाचार पत्रों को लपेटना, जो इस शहर की ही नहीं बल्कि प्रदेश और देश की जनता की आवाज उठाते हैं, उनका सरासर अपमान है।

ये सिर्फ पुतला दहन नहीं है बल्कि उस मीडिया को जलाना था, जिसके सहारे ये नेता अपनी पहचान गढ़ते हैं। भाजपा की नारी शक्ति, ज़रा आइना देखिए। जिन अखबारों में छपने के लिए नेता बेताब रहते हैं, जिनकी एक-एक कटिंग को फेसबुक पर 'मीडिया की नजर' में लिखकर गौरव की तरह पेश किया जाता है, उन्हीं अखबारों को आपने पुतले पर लपेटकर आग के हवाले कर दिया। ये विरोध था या कृतघ्नता का सार्वजनिक प्रदर्शन!

हालांकि मेरे ये लिखने से क्रांति नहीं आने वाली, पर हो सकता है कि कुछ दिनों तक राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की आंखों पर लाज का 'झीना पर्दा' पड़ जाए। अरे, महिला शक्ति... आपको विरोध प्रदर्शन करना ही था, लेकिन इस बात का तो ख्याल कर लिया होता कि जिस पुतले को आग लगाई गई, उसमें उन्हीं को लपेट लिया गया, जिनमें छपने की हर किसी की लालसा होती है। ऐसा करते वक्त मीडिया की इतनी लाज तो रख ली होती। 

(अब देखें वीडियो) -


इस वीडियो को देखकर मन इसलिए भारी हुआ क्योंकि करीब तीन दशकों से प्रिंट मीडिया की धूल फांकते-फांकते, स्याही को खून-पसीने की तरह बहाते हुए यहां तक पहुंचा हूं। इस लंबे समय में लगभग सभी प्रतिष्ठित अखबारों में काम किया, जिम्मेदारियां निभाईं। 'दैनिक जागरण' मेरे लिए सिर्फ अखबार नहीं, गुरुकुल रहा। यहीं से पत्रकारिता का ककहरा सीखा, यहीं से पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ। 'हिंदुस्तान' से रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं, आत्मीय है। जब बरेली मंडल में इसकी नींव रखी जा रही थी, तब बदायूं में दिन-रात एक कर, पहले ब्यूरोचीफ के तौर पर उसे खड़ा करने में मेरा भी पसीना लगा और जब जिंदगी मौत की दहलीज पर खड़ी थी, तब 'अमर उजाला' सिर्फ अखबार नहीं, ढाल बनकर खड़ा था। केवल मानसिक ही नहीं, आर्थिक सहारा देकर अमर उजाला प्रबंधन ने वो किया, जो इस पेशे में अपवाद ही माना जाएगा। ऐसे में इन अखबारों से रिश्ता सिर्फ काम का नहीं, 'कर्ज' का है, लेकिन भाजपा की महिला शक्ति ने जिस तरह इन्हीं अखबारों को पुतले में लपेटकर आग के हवाले किया, उसने मुझे भीतर तक झुलसा दिया। ये विरोध नहीं था ये एहसान फरामोशी थी। ये विरोध प्रदर्शन का तरीका नहीं था ये समझ का 'दिवालियापन' था।

ऐसे में केवल भाजपा ही नहीं, अन्य राजनीतिक दलों से भी सीधा सवाल है। क्या आपकी लड़ाई मुद्दों से है या मीडिया से? अगर मुद्दों से है, तो उसे तर्क से लड़िए, अखबार जलाकर नहीं। और हां...अगली बार जब सोशल मीडिया पर 'मीडिया की नजर' में फोटो पोस्ट करें, तो उस पुतले की तपिश को जरूर याद कर लीजिएगा, जिसमें आपने अपनी ही साख को जलाया था।

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ऐसी ही 'मन की बात' पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें-

- इन तस्वीरों में गोल घेरे वाले चेहरों को देखिये...नरसंहार पर 'संवेदना' जता रहे हैं, फिर भी मुस्करा रहे हैं

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(मुख्य फोटो- सौजन्य एआई)






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